Skip to main content

संगठित राष्ट्र-जीवन का लघु कुम्भ



परम वैभवशाली राष्ट्र’ इस उद्देश्य के साथ भारत के प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ सत्ता की राजनीति से अलिप्त रहते हुए एक अपराजेय जनसत्ता अर्थात राष्ट्रशक्ति के निर्माण में जुटा हुआ है । प्रत्यक्ष शाखा कार्य और अपने लगभग 40 अनुषांगिक सगंठनों के साथ संघ निरंतर अपने ध्येय की ओर आगे बढ़ रहा है । संघ के इस अति विशाल वास्तविक स्वरुप का प्रतिनिधित्व करती है अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की वार्षिक बैठक (8 मार्च से १० मार्च- ग्वालियर) ।

 
इस वार्षिक बैठक में संघ के वैचारिक आधार, अतुलनीय कार्यपद्धति और संघ का उद्देश्य इत्यादि को एक साथ, एक स्थान पर समझा और देखा जा सकता है । भारत के कोने-कोने से आये प्रतिनिधियों को एक परिवार के रूप में देखकर ऐसा लगता है मानो एक अनुशासित, संगठित और उन्नत राष्ट्र अपने लघु आकार में साकार हो गया हो । प्रयागराज कुम्भ के अवसर पर करोड़ों देशवासियों की जिस भावनात्मक एकजुटता के दर्शन होते है उसी का अनुभव इस वार्षिक बैठक में होता है ।

संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की ये बैठक वास्तव में एक लघु कुम्भ ही होता है जो 12 वर्षों के बाद नहीं प्रत्येक वर्ष सम्पन्न होता है । इस बैठक में भाग लेने वाले लगभग डेढ़ हजार प्रतिनिधि राष्ट्र जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हो रहे संघ कार्य का लेखा जोखा प्रस्तुत करते है। धर्म, संस्कृति, राजनीति, किसान, मजदूर, शिक्षा, विद्यार्थी, आर्थिक जगत, वनवासी क्षेत्र, सेवा क्षेत्र, गो संवर्धन, सीमा सुरक्षा, साहित्य प्रकाशन और पत्रकारिता इत्यादि में सक्रिय संघ के समर्पित स्वयंसेवको के परिश्रम का परिचय इस लघु कुम्भ में मिलता है।

संघ के सरकार्यवाह द्वारा देश भर के कार्य की एक विस्तृत रिपोर्ट के साथ ये बैठक प्रारभ होती है । इस रिपोर्ट में वर्ष भर के संघ कार्य की प्रगति की जानकारी सभी कार्यकर्ताओं को दी जाती है । देश में विभिन्न शाखाओं एवं क्षेत्रों में हो रहे कार्य के ताजा आंकड़ों से एक दूसरे से सीखने का अवसर मिलता है । जो काम बड़े-बड़े भाषणों, लेखों, पुस्तकों और उपदेशों से नहीं होता वह तीन दिन के इस वैचारिक कुम्भ में आराम से हो जाता है ।

गहरा चिंतन (सरस्वती), स्नेहिल चर्चा (यमुना) और सर्वसहमति (गंगा) का अतिपवित्र संगम है संघ की ये अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा । इन पंक्तियों के लेखक ने स्वयं इस संगम में नौ बार स्नान किया है । उसी अनुभव के आधार पर ये कहा जा सकता है कि ये संगम वर्तमान में चर्चित ‘महागठबंधन’ से लाखों कोस दूर देव दुर्लभ समर्पित कार्यकर्ताओं का ‘महामंगल मिलन’ है।

इस वार्षिक बैठक में कार्य की प्रगति के अतिरिक्त नए अनुभवों, नए प्रयोगों, नए प्रकल्पों और नयी योजनाओं पर विस्तृत चर्चा होती है और सर्व सहमति से निर्णय लिए जाते है । राष्ट्र जीवन के प्रत्येक वर्ग/क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहे संघ के कार्यकर्ताओं ने अब पर्यावरण, जल सरंक्षण, परिवार व्यवस्था और देव स्थानों की सनातन परपंरा की रक्षा इत्यादि क्षेत्रों में भी कार्य करने का निश्चय किया है ।

आत्म प्रशंसा, अंधाधुंध प्रचार, काम-कम, बताना अधिक और मनगढ़ंत/ कागजी राजनीतिक कार्यप्रणाली को पूर्णतया तिलाजंली देकर संघ अपनी सेवाभावी, ध्येयनिष्ठ और परिस्थिति निरपेक्ष कार्यपद्धति पर अड़िग रहकर कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है ।  संक्षेप में यही है इस चिंतनशाला (प्रतिनिधि सभा) का परिचय । .............क्रमशः जारी



नरेन्द्र सहगल
पूर्व संघ प्रचारक, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
9811802320




Comments

Popular posts from this blog

कश्मीर : अतीत से आज तक – भाग दो

वीरव्रती दिग्विजयी कश्मीर नरेन्द्र सहगल हम सभी भारतीयों को कश्मीर की गौरवमयी क्षात्र परंपरा और अजय शक्ति पर गर्व है। विश्व में मस्तक ऊंचा करके 4000 वर्षों तक स्वाभिमान पूर्वक स्वतंत्रता का भोग कश्मीर ने अपने बाहुबल पर किया है। इस धरती के हिन्दू शूरवीरों ने कभी विदेशी आक्रमणकारियों और उनके शस्त्रों के सम्मुख मस्तक नहीं झुकाए। मध्य एशिया तक फैला कश्मीर राज्य अनेक शताब्दियों तक इस वीरभूमि के रणबांकुरों ने विदेशों से आने वाली घोर रक्तपिपासु तथा जालिम कहलाने वाली जातियों और कबीलों के जबरदस्त हमलों को अपनी तलवारों से रोका है। आधुनिक इतिहास के पन्ने भी साक्षी हैं कि कश्मीर  की खड़ग के वार मध्य एशिया के सुदूर क्षेत्रों तक पड़े थे। कश्मीर की इस दिग्विजयी विरासत को नकारा नहीं जा सकता। सनातन कश्मीर का विस्तृत इतिहास राजतरंगिणी नामक ग्रंथ में मिलता है। यह सारा इतिहास महाभारत काल से प्रारम्भ होता है। इस दिग्विजयी कालखंड का प्रारंभ गोनंद नामक सम्राट के शासनकाल में हुआ था। पाण्डव वंश के राजाओं ने भी कश्मीर पर राज किया। पाण्डव नरेश संदीपन की देखरेख में ही प्रसिद्ध शंकराचार्य मंदिर का नि...

संघ की प्रतिनिधि सभा, भाग- 4

संघ साधना का शंखनाद- राष्ट्रहित सर्वोपरि अ खिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव मात्र खानापूर्ति की श्रेणी में नहीं आते। एक क्रमबद्ध प्रक्रिया और गहरे विचारमंथन के पश्चात पारित किए जाने वाले इन प्रस्तावों में जनसत्ता और राजसत्ता दोनों के लिए दिशानिर्देश निहित होता है। ये प्रस्ताव संघ के हित के लिए नहीं , राष्ट्र के हित के लिए पारित होते हैं।     इस वार्षिक बैठक में जारी एक वक्तव्य में स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आज़ाद हिंद फौज द्वारा 21 अक्तूबर 1943 को सिंगापुर में आज़ाद हिंद सरकार का गठन हुआ। इस सरकार को जापान और जर्मनी सहित 9 देशों ने मान्यता दे दी थी। जापान और आज़ाद हिंद फौज के सैनिक अभियानों के फलस्वरूप अंडमान और निकोबार द्वीप समूह पर इस सरकार ने 30 दिसंबर 1943 को भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराकर भारत की आज़ादी का बिगुल बजा दिया था।     अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े जा रहे स्वतंत्रता संग्राम के इस अंतिम निर्णायक अध्याय को इतिहास से गायब कर देने के कुप्रयास के विरुद्ध संघ का ये वक्तव्य एक एतिहासिक दस्तावेज़ है। आज़ाद हिं...

अज्ञात स्वतंत्रता सेनानी : डॉक्टर हेडगेवार – 8

नरेंद्र सहगल देश की स्वतंत्रता के लिए प्रत्येक आंदोलन एवं प्रयास का गहराई से अध्ययन करने के लिए डॉक्टर हेडगेवार कोई भी अवसर नहीं छोड़ते थे. कांग्रेस के गर्म धड़े के नेता डॉक्टर मुंजे ने एक  ‘ रायफल एसोसिएशन ’  बनाई जो युवकों को निकटवर्ती जंगलों में ले जाकर निशानेबाजी तथा सामने खड़े शत्रु का प्रतिकार करने का प्रशिक्षण देती थी. डॉक्टर हेडगेवार ने भी डॉ. मुंजे के साथ कई दिनों तक जंगलों में रहकर यह प्रशिक्षण प्राप्त किया. वैसे तो उन्होंने कलकत्ता में अनुशीलन समिति में अपनी सक्रियता के समय निशानेबाजी तथा बम विस्फोट करने की सारी विधियों की अच्छी जानकारी प्राप्त कर ली थी. रष्ट्रवादी पत्रकार डॉक्टर हेडगेवार एक समय था, जब कांग्रेस के सभी नेता पूर्ण ध्येय को समक्ष रखकर स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा तक तय करने से घबराते थे. उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भारतीय या राष्ट्रीय जैसा एक भी संस्कार नहीं था. ऐसे अंग्रेजपरस्त माहौल में डॉक्टर जी द्वारा गठित संस्था  ‘ नागपुर नेशनल यूनियन ’  ने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता का उद्घोष करके अंग्रेजों को खुली चुनौती दे दी थी. अ...